"जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति रहित हो कर कर्म करता है वो जल से कमल के पत्ते के भाँती पाप से लिप्त नहीं होता ." -- Geeta, 5th chapter
तेरा अधिकार केवल कर्म पर है कर्मफल पर नहीं, इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत बन,ना ही कर्महीनता में तेरी आसक्ति हो.