ना मैं राधा, ना मैं मीरा, ना मैं सीता, ना ही त्रिकुटा,
ना तू कान्हा, ना ही तू मेरा राम,
फिरभी तेरे सूरत में दिखे क्यों मुझे श्याम?
राम सी आभा, कान्हा सी मुस्कान
ईस्वर सा लगे क्यों मुझे ये तेरा नाम?
तेरे इशारें मुझे भुलाये अंजाम
भक्ति में बस तेरे अब मेरा मान।
राधा बावरी छोड़ी संसार
मीरा का तो तू ही घरबार
सुन सखारे मोहन प्यारे
त्रिकुटा को अब भी तेरा है इन्तेजार।
अंगारों पर भी पाव ना काँपे रखने को जो तेरा मान
हर युग में विराज वो नारी, नाम से उसे सती या फिर सीता जान
सती न कहना, न कहना पार्वती, तो भी मेरे लिए तू चान्द्रमान
ना भूमिजा ना त्रिकुटा, पर राघव क्यों न लू तेरा नाम?
न कहना राधा न पुकारना मुझे मीरा
फिरवी केशव तू मेरा वही पुराना हिरा।
असम्पूर्ण।।।।