Monday, May 27, 2013

गीता भाव-उदाहरण भाग १

कभी कभी एक ग़ज़ब सी feeling होती है। पता नहीं गीता पढने से पहले से ये थी या बादमे हुइ। गीता पढना चालू किये भी तो बर्षो हो गये। कभी कभी जब रात होती है, सब सुनसान होता है, पर चाँद की चांदनी पेड़ो के पीछे से झलक मारती है, एक छोटा सा कुछ ६'' diameter का उजला सा चाँद कुछ छुपे, कुछ गहरे से दाग उसमे, उसको चारो और से घेरे चांदनी कुछ ९ १/२ ' के radius में, फिर चारो और बादलो का जमावरा, सितारें फीके पर जाते हैं चांदनी के पीछे। उस चांदनी में सारे बृक्ष, उनके बिच झील, सब एक अलग ही gray scale video का रूप
लेते हैं। ग़जब सी सुहानी ठंडक होती है हवा मे। तब, बस तब 'मैं' कहीं नहीं रहती। मेरा अस्तित्व बिखर सा जाता है, तब हवा में मैं होती हूँ, झील के पानी में मैं होती हूँ, दूर पेड़ो के शाखों में मैं होती हूँ, प्रकृति के हर एक कण में मैं होती हूँ। सच, ऐसी चांदनी रात में मैं इंसान के रूप में अपना अस्तित्व भुला कर प्रकृति के साथ एक हो जाती हूँ। प्रकृति के हर एक कण में खुदको महसूस करती हूँ। उपलब्धि करती हूँ के इन्सान प्रकृति के ही कणो से बना हुआ एक बिषेस प्रकार का तंत्र मात्र है. प्रकृति से बनना , develop होना  और फिर उसी में मिल जाना है। फिर उसी के कुछ हिस्से फिरसे किसी और एक नया तंत्र का हिस्सा बनता है. सोच कर बड़ा आनंद आता है के ये चाँद में ये चांदनी भी मैं, ये हवा मैं, ब्रिक्ष मैं और ये झील भी मैं ही हूँ। फिर अपने आप से सवाल करती हूँ, अगर ये रात न होकर दिन होता, चाँद की मीठी चांदनी न होकर अगर २१ June की दोपहर की धुप होती, ठंडी हवा न होकर लू होती, तो भी क्या उन सबमे मैं होति। फिर लगता है, "ना: फिर मेरा नशा उतर जाता, फिर मैं इंसान ही होती!"

सो फिर कभी गर मैं न रहूँ, गर मेरी याद आये, गर लगे के मुझे खो दिया, फिर मुझे पाना चाहो, तो उदास न होना, बस इन्तेजार करना, चांदनी रात की, हवा के ठंडक की, के उनमे मैं होंगी। जब किसी झील की कांच से साफ़ पानी में देखो तो समझ लेना मैं वही हूँ, पेड़ के शाखों में मैं हूँ। नज़र उठा कर ऊपर देखना, किसी पेड़ के बिचली शाख पर दो पंछी घोसला बना रहे होंगे; उनमे मैं हूँ, उन तिनको में मैं हूँ, उनके अन्डो में भी मैं ही हूँ। नीचे देखना कुछ बच्चे खिलखिलाते, किलकारी मरते दिखाई पड़ेंगे। उनके खिलखिलाहट में मैं हूँ। जब ये सब तुम्हे मोह रहे होंगे तो चुपके से एक बिल्ली तुम्हारे ही पास आ के बैठी होगी, उसमे मेरा ही हिस्सा होग।

शांत रातमे जब अपने balcony में खड़े किसी चिंता में खोये होगे, आँखें बंद करना। एक ठंडी हवा का झोका गालो को छू जायेगा, समझ लेना मैंने कहा, "चिंता मत करो, मैं हूँ न।" जब May के ताप ने, काम के चाप ने, अन्दर, बहार, सब जला रखा होगा, तब याद करना, बारिश बनके आउंगी तुम्हारे लिये। बस थोडा हंस देना। जब बुढ़ापे में अन्दर कहीं खालीपन महसूस करो, तभी देखना एक खिलखिलाता बच्चा आ कर तुम्हारे गोद में खड़े होकर झट से गले लगाएगा। वो बच्चा मैं ही तो हूँ। उस बच्चे को गोद में बिठाकर उसके कोमल हाथो को पकड़ते हुए सामने देखना, एक १६ - १७ साल की बच्ची एक १७ - १८ साल के बच्चे को किसी यश राज movie style में propose कर रही होगी। समझ लेना वो मैं ही हूँ। अन्दर जाना, देखना एक माँ परम ममता से अपने बच्चे का tiffin pack कर रही होगि। पहचानने में गलती मत करना। फिरसे देखो, वो मैं ही तो हूँ।

और सच बताऊ, जब वो लम्हा आएगा, जब तुम्हे सारे बन्धनों से मुक्ति मिल जानी होगी, तब लकरीयों के सेज पर, तुम्हारा हाथ पकडे तुम्हारे साथ ही नहीं, बलके तुम्हारे अन्दर, तुम्हारे हर कण में, तुमसे एक हो जाने को मैं ही तो हूँ। 

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